मंगलवार, 25 मार्च 2014
कितना सहा ,कितना कहा ?
रविवार, 14 अगस्त 2011
जो आजाद हैं उनके लिए
डगमगाता हुआ २४ तीलियों का भारी भरकम पहिया
चटक रंगों के साथ आजादी का उत्सव मनाता हैं
ये आजादी उनके लिए भी जो आजाद है, जो नहीं हैं उनके लिए भी ये आजादी है
ये आजादी सीमा विश्वास ,जतिन मरांडी और उन जैसे सैकड़ों के लिए भी है
जो आजाद नहीं है
ये आजादी कपिल सिब्बल , पी चिदम्बरम और मनीष तिवारी के लिए भी हैं
क्यूंकि वो आजाद हैं
ये आजादी अन्ना हजारे के लिए भी है
जिसका इस्तेमाल कर वो सारे देश की बत्तियां बुझा सकते हैं
ये आजादी धिनकिया के लिए भी है ये आजादी लालगढ़ के लिए भी
ये जंगल में जमीन के लिए लड़ रहे उन साथियों की भी आजादी है
वो चाहें तो आज करमा गा सकते हैं
ये आजादी लाल किले के प्राचीर से शोर मचाते उस आदमी के लिए भी है
जो नए भारत के सपनों की पोटली खोल हवा में उडाता है
उन सपनों में से कुछ को
कुर्सी पर बैठ चाय के साथ टीवी देख रहा दूसरा आजाद आदमी
उठाता है ,और चाय के साथ घुटक जाता है
ये आजादी हर उस एक आदमी के लिए भी है
जिसकी निगाहें आसमान पर नहीं है
जो भी अगल बगल या पीछे देख रहा है
वो कटघरे में खड़ा है |
ये आजादी विजयी विश्व तिरंगा गा रही बच्चों की उस भीड़ केलिए भी है
जो फिर से उसी २२३ नंबर गली से गुजरती है
और अपने सफ़ेद जूतों पर लगी गन्दगी को तकती है
ये आजादी गली के मोड़ पर खड़े उस राजेश मेहतर के छोटे बेटे की भी है
जो नंगा ही अपने टायर को भीड़ से आगे दौडाता है
ये आजादी दिलीप मंडल और शीबा असलम फहमी की भी है
वो चाहें तो फेसबुक पर फिर "आरक्षण " के बहाने
प्रकाश झा और आधे हिंदुस्तान को गरिया सकते हैं
ये आजादी कटते जंगलों की भी है बढते शहरों की भी
ये आजादी शेर ,सियार ,गीदड ,बांगड
बैर पियार की भी है
ये आजादी पूनम पांडे की भी है अरुंधती राय की भी
ये आजादी मेरी भी है तुम्हारी भी
मैं चाहूँ तो आज चादर ओढ़ कर सो सकता हूँ
या पत्नी से कह सकता हूँ
तुम आज आज कुछ नया बनाओ और हमें खिलाओ
गुरुवार, 4 अगस्त 2011
तुम नए पत्थर उठा लो श्वेताम्बरा !

सुनो श्वेताम्बरा
अब शाम होने को है
लपेट लिया है मैंने बादलों के चादर में
अपने हिस्से का आसमान और वो सब कुछ
जो सफ़र में हमारे साथ थे |
इनमे थोड़ी सी बरसात, चुटकी भर धुप
तुम्हारी पलकों जितनी छाँव और हाँ कुछ शब्द भी है
तुम कहो तो मैं
वो बची खुंची आंच भी ले लूँ
जो तुमने मेरे लिए रख छोड़ी थी |
मैं उन पत्थरों का भी बोझ भी सफ़र में उठा सकता हूँ
जिन्हें तुमने यूँ ही मेरी चौखट पर बिखेर दिया था
बस शर्त ये है कि तुम नए पत्थर उठा लो |
बोलों श्वेताम्बरा बोलो
उन ठावों के बारे में बोलो
जहाँ हमने दो पल रुक कर गहरी साँसें ली थी
और तुमने ढेर सारे फूल अपने दुपट्टे में इकठ्ठा कर लिए थे
तुम कहो तो वहां पड़े तुम्हारे क़दमों के निशान
और फूलों की शिनाख्त भी मैं इस चादर में रख लूँ |
मैं अपनी बाहों के घेरे में बंद
उस एक वक्त को भी सफ़र में ले जाना चाहता हूँ
जिनमे तुम्हारी बंद आँखों की नमी
दहलीजों की इबादत कर रही होती है |
मैं एक कोने में रखी
कुछ चीखें ,कुछ दुआएं ,कुछ चुप्पियाँ भी लिए जाता हूँ
कभी- कभी कुछ बेवजह की चीजें सफ़र में काम आती है |
सुनो श्वेताम्बरा
मेरे जाने की आहट को सुनो
किवाड़ों को बंद कर लो
मुसाफिरों के फिर से लौटकर आने का पता दरवाजों से नहीं
बंद आँखों में जागते उन सपनों से भी मिलता है
जिन्हें हम वक्त की तरह आँखों के आगे से गुजर जाने देते हैं
और वो सपने मैंने तुम्हारे लिए उसी एक जगह रख छोड़े हैं
जहाँ से मेरे - तुम्हारे रास्ते बदलते हैं
रविवार, 31 जुलाई 2011
हाँ तुम नहीं हो ,कहीं नहीं हो
तुम्हारे शब्द भी नहीं हैं ,तुम्हारी आहट भी नहीं
एक चुप्पी है
जो वो कुछ कह रही है जो तुम्हारी मौजूदगी कहती
तुम कह सकती थी इस बार बादल कुछ ज्यादा बरसे हैं
जंगल हरे रहेंगे
तुम बातें कर सकती थी उन गरम पहाड़ों के बारे में
जिन्हें तुमने अक्सर ख्वाबों में देखा है
और तुम्हे यकीं है कि ये पहाड़ बादलों की तरह तुम्हे भी बुलाते हैं
तुम सड़कों की सरगोशी और शहर की मदहोशी पर भी
कुछ न कुछ कहती
तुम्हे न जाने क्यूँ लगता है कि उनका ये हाल
हमारी मुलाकातों के बाद हुआ है |
तुम्हारी बतकही में मेरी कमीज के रंग और वो नज्में भी शामिल होती
जिनमे अक्सर मैं अनायास ही ख़ुद को ढूंढ़ता हूँ
बहुत मुमकिन है
उस एक वक्त मैं हमेशा की तरह आस्मां को तकता रहता
तुम्हारी निगाहें हमेशा की तरह जमीन पर गडी होती
तुम अपने छत से नजर आने वाली गंगा की बात जरुर कहती
और उसकी इस लापरवाही पर हंस पड़ती कि
उसने मेरे घर की देहरी से तुम्हारे शहर तक उस बोतल को पहुंचाने में एक सदी लगा दी
जिसमे मैंने तुम्हारे नाम का एक कागज़ रख छोड़ा था
तुम प्यार के उन तमाम किस्मों पर भी जरुर बातें करती
जिन्हें तुमने
दहलीजों को तहजीब सिखाने के दौरान जाना
और मैं नावाकिफ रहा
तुम उन सभी चीजों पर भी जरुर कुछ न कुछ कहती
जिन्हें आधा -आधा बांटते हुए हम ख़ुद बँट गए
तुम शायद उस दर्द को न कहती
जिन्हें हम तब जान पाते हैं
जब किसी के होने और किसी के न होने का अंतर
ख़त्म हो जाता है
यकीं मानो ये चुप्पी उस दर्द को सहती है
फिर कहती है
हाँ ,तुम नहीं हो ,कहीं नहीं हो
सोमवार, 25 जुलाई 2011
सुनो श्वेताम्बरा
सुनो श्वेताम्बरा
किस्से सुनाते सुनाते शहर सो गया है
बादलों के शामियाने में
बूंदों की बैचैनी बहुत कुछ ले जाती है
बहुत कुछ कह जाती है
कविता अकेले कोने में आधी भीगी - आधी सूखी
छाता लगाये खड़ी है
कलम सिरहाने / अपने स्मृति -भ्रंश पर
सफाई देते -देते थक चुकी है
इस वक्त छत, सिनेमा का पर्दा है
और आँखें प्रोजेक्टर
वो सब कुछ जो तुमने कहे और जो तुमने न कहे
एक साथ मुझसे रेजोनेंस कर रहे
मैं चाहता हूँ कि तुम इस सोये हुए शहर को जगाओ
आओ मुझे फिर से लोरियां सुनाओ
या कोई गीत गाओ
ये भी न हो सके तो शहर के लिए ही सही
लड़ो ,झगड़ो और लौट जाओ
शनिवार, 11 जून 2011
विज्ञान

आदमी का शीशे में तब्दील होना
कोई रासायनिक अभिक्रिया नहीं
एक सामान्य भौतिक क्रिया है
जूझते ,डरते ,सहमते या फिर प्यार करते हुए आदमी
की शिराओं में
घटता बढ़ता रक्तदाब
उसे अक्सर शीशा
तो कभी -कभी पत्थर बना जाता है
टूटने के लिए जुड़ते हुए लोग
इस शहर में अकेले नहीं हैं
इस भीड़ के लिए अब वक्त है
कि वो अंकगणित को भी जाने |
गुरुवार, 2 जून 2011
सुनो श्वेताम्बरा,अब मैं टूट रहा हूँ

सुनो श्वेताम्बरा
अब मैं टूट रहा हूँ
स्मृतियों के चादर के गुलाबी रंग पर
इस मौसम के पीले पत्ते भारी पड़े हैं
थके हारे जिस्म में उत्तर चुकी आँखें
अब हथेलियों को नहीं आसमान को तकती है
कविता की जुगाली के लिए
अंगुलियाँ शब्दों को चबाती है|
कहो श्वेताम्बरा क्यूँ कर
तुमने बेंच दिए थे घर के सारे आईने
और अपने कमरे में लगा लिए थे गुलमोहर के फूल?
तुम्हे नहीं मालूम
तुम्हारे भेजे गए बादल मेरे आँगन में बरसते हैं
ये सूरज मुझे कर्जदार समझता है
और जमीन किराया मांगती है
बोलों श्वेताम्बरा
क्यूँकर बदल रही है तुम्हारी रंगत ?
तुम क्यूँकर रंगतराश नहीं हुई ?
मैं भी तुम्हारे उन रंगों में रंगता
जिनका विज्ञान सिर्फ तुम्हे पता है
कभी ज्यादा सा लाल ,कभी कम सा हरा
सुनो
मैंने तुम्हारे उन रंगों को भी देखा है
जो तुमने मुझसे छुपाये है !
ये मेरी चोरी नहीं बेरंग सी कुंठाएं हैं
तुम इनके लिए मुझे सजा न दो
तुम्हारी सपनों का रंग /
तुम्हारी हँसी का रंग
तुम्हारी धडकनों का रंग
और हाँ ,तुम्हारी ग़जलों का रंग भी मैं देख सकता हूँ |
सुनो श्वेताम्बरा
अब मैं भी लौट रहा हूँ
सारे सिरे साथ लेकर
जानता हूँ-
इन सिरों को ढूढने की कोशिश तुम नहीं करोगे
मगर
लौटते हुए क़दमों की आहट को तो सुनो
दो तलवों भर की खाली जगह भी
कभी -कभी उम्र भर की खेती के काम आती है
शनिवार, 7 मई 2011
चुप्पियों के साथ

चुप्पियों के साथ
आस- पास तुम्हारी मौजूदगी
मुझे बेहद अच्छी लगती है
कुछ भी कह पाने की मुश्किलें जितनी बढती है
उतने ही करीब आ जाते हो तुम
अब तो तुम भी जान गए हो
ज्यों - ज्यों शब्द, सलीकों के साथ बीच में आते हैं
तुम्हे उतना ही खोता चला जाता हूँ मैं
खुद को उतना ही अकेला पाता हूँ मैं
मगर ये भी सच है कि
चुप्पियों के साथ
तुमसे थोड़ी सी भी दूरी मुझे बेहद कठिन लगती है
कितना मुश्किल होता है
दूरियों को चुपचाप सहना
समय के साथ-साथ न चाहते हुए भी बहना
उस वक्त बहुत मुमकिन है मैं उन बातों पर भी उदास होऊं
या फिर नाराज हो जाऊं
जिन बातों पर मै अक्सर मुस्कुराता हूँ
उस एक वक्त /तुम्हारी कविता भी बेवफाई की एक किस्म लगती है
तस्वीरों में मुस्कुराती तुम
पार्क स्ट्रीट की लोपा बनर्जी जैसी लगती हो
जिसके लिए प्यार और गोलगप्पों में कोई ख़ास अंतर नहीं है
सच कहूँ तो मैं उन सारी तस्वीरों पर स्याही उडेलना चाहता हूँ
और चाहता हूँ/ तुम्हे यूँ मुस्कुराता देखने वाले सारे लोग नरक में जाएँ
इन दूरियों के बीच तुम्हारी जिद्द
मुझे साजिश सी लगती है
तुम्हे याद है न? ये वही जिद्द है
जिनके लिए मैं न चाहते हुए भी तुम्हे ठहाके लगा कर दिखाता था
अब मै ठहाके नहीं लगाता
अपनी फटी हुई जेब को टटोलता हूँ
या फिर खुद को श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ
जानता हूँ इस बार
चुप्पियों के बीच
देह का द्वन्द भी नंगा हो रहा है
तुम इस बार मेरी नियत को आंक रहे हो
बार -बार जो मुझमे कभी नहीं था
उसको झाँक रहे हो
मगर मैं ,फिर भी दूरियों को सह रहा हूँ
क्यूंकि
चुप्पियों के साथ
आस- पास तुम्हारी मौजूदगी
मुझे बेहद अच्छी लगती है
मंगलवार, 1 मार्च 2011
मैं फिर भी साथ चलूँगा

कच्ची -पक्की ,टेढ़ी -मेढ़ी राहों पर जब चलते चलते थक जाओगे
थम जाओगे
पत्थर जैसे बन जाओगे
तब पाओगे
मुझे अकेला ,उन राहों पर
जिन राहों पर
तुमने मुझसे भरी दूपहरी छाँव छिनी थी
ठांव छिनी थी
मेरी आँखों के सपनों के रंग छीने थे
जीने के सब ढंग छीने थे
मैं अकेला उफ़ ये मेला
फिर भी तुम तक आ जाऊंगा
गीत पुराना फिर गाऊंगा
सावन बीते जाये पिहरवा
मन मेरा घबराये पिहरवा
तब तुम मुझसे ये न कहना
तुम कितना अच्छा हँसते हो
तुम कितना अच्छा गुनते हो
मै भी तुम्हरे साथ चलूंगी
हँसते गाते रोते लड़ते
साथ जियूंगी ,खूब जियूंगी
फिर एक दिन ऐसा आएगा
जब तुम सपनों से जागोगे
इन राहों पर चलते -चलते
उस मंजिल को याद करोगे
जिस मंजिल पर
तुमने कब से
एक कहानी
जिसमे राजा था और रानी
बुन रखी थी
उस मंजिल पर तुमको अपने
मीत मिलेंगे जीवन के संगीत मिलेंगे
साज मिलेंगे ,राग मिलेंगे ,जीने के अंदाज मिलेंगे
फिर उस मंजिल पर आकर
मुझको बेबस ,तनहा पाकर
तुम दरवाजा बंद करोगे
हर एक बात पर रंज करोगे
उम्मीदों पर तंज करोगे
सफ़र अकेला रेलम रेला
खुद में बंटकर रह जाऊंगा
गीत नहीं फिर गा पाउँगा
लेकिन फिर भी मैं कहता हूँ
मैं आऊंगा ,फिर आऊंगा
जब तुम पत्थर बन जाओगे
थक जाओगे
थम जाओगे
गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011
तुम्हे प्यार करते हुए

तुम्हे प्यार करते हुए
मुझे अच्छी लगती है वो सभी औरतें
जिनसे मुझे प्यार हो सकता था
गुडिया हाट में घुमती /दुकानदारों से लडती
पर्स में छोटे बड़े नोटों की परतें लगाये
मोटी बिंदी वाली औरतें
वो औरतें/ जो खूबसूरती को प्यार करने की शर्त माने हुए
अपनी उम्र में/ उतनी ही स्थिर हैं
जितनी तुम मेरे प्यार में हो |
तुम्हे प्यार करते हुए
मुझे बेहद पसंद आती है
"कभी - कभी " की राखी गुलजार
जी में आता है
उसे बाहों में ले लूँ
और इस बार
वो मेरे लिए गाये
"कभी - कभी मेरे दिल में ख्याल आता है "
तुम्हे प्यार करते हुए
मुझे प्यार आता है /उन दुश्मनों पर
जो बदजात सिर्फ और सिर्फ
तुम्हे चाहने के लिए पैदा हुए हैं
मै चाहता हूँ कि /उनकी रात के किसी कोने में
मैं भी शामिल होऊं
उनके बालों पर हाँथ फेरूँ या फिर उन्हें अपने हिस्से की नींद दे जाऊं
मैं उन्हें अपनी हथेली के /उस हिस्से को भी चूमने को कह सकता हूँ
जिस पर तुम्हारे होठों के निशान /अब भी सुर्ख हैं
तुम्हे प्यार करते हुए
मुझे अच्छे नहीं लगते ग़ालिब
अपनी गलियों में मजमा लगाकर किस्मत का रोना रोते हुए
अगर कभी मिले तो मै
कह सकता हूँ उनसे
कभी हमारे दरवाजे आओ
गजलों का सफ़र वहाँ से शुरू होता है
जहाँ से तुम आसमान की और देखकर मुस्कुराती हो
तुम्हे प्यार करते हुए
तुम्हे प्यार न करना भी मुझे अच्छा लगता है
मै चाहता हूँ कि
वापस फिर से वहीँ पहुँच जाये
उस एक सुबह में
जहाँ/ एक कोने में भूत बन कर बैठी तुम
वाष्पीकरण के सिद्धांत को समझते -समझते
उस एक सफ़र की और निकल पड़ती हो
जहाँ तुम्हे
उड़े हुए/खाली और बेतरतीब से दिन मिलते हैं
फिर भी मेरे प्यार में पड़ी तुम
बार -बार बूँद बन पिघलती हो /मेरे सीने पर
और जहाँ से मै -
तुम्हे प्यार करते हुए
तुम्हे प्यार न करने की कोशिशें जारी रख सकता हूँ
रविवार, 2 जनवरी 2011
फासलों के बीच

मेरे और उसके बीच
एक नंबर का ही फासला था
जो उसने ड्राइंग रूम के कैलेंडर में लिख रखा था
ढेर सारी जरुरी-गैर जरुरी/ तारीखों के बीच
मगर वो फासला ख़त्म न हो पाया
जैसे कभी ख़त्म नहीं होती/ शहर की भीड़
या फिर पहाड़ के उस पार का सन्नाटा
जहाँ आजकल मै/ अकेले चौपाल लगाता हूँ
ये फिर न हुआ कि
मेरे फोन की घंटी बजे और मुझसे ज्यादा वो खुद ही खुद को सुनते हुए कहे
"काहें बिना बात नाराज होते हो ?
मै ऐसी ही हूँ"
ये भी न हुआ कि वो लिखे कोई कविता
और चौराहे पर यूँ सजा आये
कि मेरी निगाह उसे पढ़े
और मै ही दौड़कर उसे कसकर थाम लूँ|
उसने कोई ख़त भी न लिखे
वो ख़त /जिनमे उसका अंकगणितीय ज्ञान साफ़ नजर आता था
मै आधी तुम्हारी हूँ /और आधी सारी दुनिया की
मैं तुमसे/ तुम्हारी पूरी दुनिया के बारे में न पूछूंगी
तुम मेरी आधी दुनिया से दूर रहो|
कहते हैं कि
वो उस एक रात जो कि
शायद किसी साल की पहली तारीख थी
अंधेरों से मुंह बचाकर
उजालों की बस्ती में चली गयी
उस बस्ती में/ जहाँ उसके बचपन का वो साथी था
जिसने उसे गीत और घर दोनों दिए थे
"हमें तुमसे प्यार कितना "
उसके पास फासलों को बनाये रखने की जिद्द थी
मेरे पास अंधेरों के बावजूद
दूरियों को सहने की /एक आखिरी कोशिश
मुमकिन है/ उसकी जिद्द और मेरी कोशिशें कामयाब हो जाएँ
ये भी मुमकिन है/ वक्त साजिशन इन फासलों के बीच
किसी मोटी दीवार की चुनाई कर दे |
ये भी हो सकता है
वो मेरी कविताओं के पन्नों पर
एक बार फिर
सारी दवात उड़ेल डाले
और कहे /तुम मुझे गूंगे ही अच्छे लगते हो/
तुम्हारी कविताओं के शब्द जब मेरे इर्द गिर्द होते हैं/
तो मुझे घुटन होती है/
ये घुटन उस वक्त भी हुई थी जब
तुमने मुझे पहली बार पिघलाया था
और मै बिलख पड़ी थी,
तुम उन शब्दों को
उन दरवाजों के पीछे रख दो
जिन को मैंने न जाने क्यूँ /उस एक दिन अचानक खोल दिया था ?
और उनके पीछे तुम बैठे थे
कुरूप-
घुटनों में सर छुपाये हुए
और मै न चाहते हुए भी
तुमसे वाष्पीकरण की प्रक्रिया समझ रही थी |
इन फासलों के बीच जो भी हो
एक चीज तय है/
बहुत कुछ उस एक जगह ठहरा हुआ रहेगा/
जहाँ वो पहले था
तकते हुए/
हमें और तुम्हे/
कि हम आयेंगे ,उन फासलों को तोड़
और उन्हें फिर से साथ लेकर चलेंगे
मगर हम जानते हैं ,तुम आगे बढ़ चुके हो
उन ठहरी हुई चीजों के आगे/
फासलों को फासला बनाये रखने की आदत
तुमने अभी अभी सीखी है
और हाँ- ये आदमी को गैरतमंद बनाये रखने के लिए जरुरी है|
शनिवार, 25 दिसंबर 2010
हम एक बार फिर मिले

हम एक बार फिर मिले
जैसे कोई शहर,किसी मुसाफिर से मिलता है
जैसे ओस की बूँद पत्तों से मिलती है
या फिर कोई सुर्ख शाम ,काली अँधेरी रात से
तुम्हारे साथ बदला हुआ मौसम था
कभी चटकीला हरा /कभी गुलाबी
मेरे साथ तेज धूप थी
जो तुमने मुझसे बिना पूछे एक दिन अचानक
मेरे झोले में डाल दी थी
जिसे सहेजने में मै खुद भी झुलस रहा था |
तुम इस बार भी ग़जल की एक पूरी किताब थी
मुकम्मल
हाँ ,कुछ हर्फ़ बदले हुए थे
जैसे अपराध ,वो ,लोग ,शरीर ,दायरे आदि आदि
इन हर्फों के बीच
मै खुद को ढूंढ़ता रहा
उन लमहों को ढूंढ़ता रहा /जब तुम्हारी होठों की हँसी
आँखों से अनुनाद करती थी
टुकड़ों में बंटी / उन मुलाकातों को ढूंढ़ता रहा
जिनसे हमने अपनी रातों की नींद और सफ़र के सारे समान उधार लिए थे
पर न जाने क्यूँ
उस पहली मुलाकात में /पिघला हुआ/ तुम्हारे आँख के पानी का कतरा
इस मुलाकात तक तैर आया था
जिसे लांघने का साहस अब मुझ में न था
तुम भीग रही थी
एक बार फिर भीग रही थी
जैसे उन दिनों भीगती थी
जब वो एक अनजाना लड़का
जो तुम्हे दर्द भरे गीत सुनाया करता था
किसी बात पर नाराज हो जाता था
मेरी ख्वाहिशों की वो एक पुडिया भी ,भीग कर धुल चुकी थी
जिसे तुम इस बार तुम बेहद जतन से अपने पर्स में सहेज कर लायी थी
वक़्त की मुनादी में
मुलाकात ख़त्म हुई
मुमकिन है कि हम फिर न मिले
फिर से कुछ आधा आधा न बाँट पाए
फिर से दिनों की और घंटों की गिनती न हो
और फिर से रात की आखिरी ट्रेन की कोने वाली सीट पर बैठा कोई
अपनी आँखों को रुमाल से न ढके
अगर ऐसा हुआ तो भी
शहर,तुम ,लोग सब वहीँ रहेंगे
जहाँ थे
अपनी -अपनी दहलीज में |
मैंने इस मुलाकात में ये जाना है
दहलीजें तहजीब सिखाती है और प्यार बेपरवाह बना देता है
मै बेपरवाह का बेपरवाह रहा
तुम्हारी दहलीजों को /मै तुम्हारे होठों पर सजा देख रहा हूँ
कोई- कोई मुलाकात यूँ भी होती है
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
मै लौटना चाहता हूँ

मै फिर से लौटना चाहता हूँ
उस एक पल की ओर
जहाँ पावों की धूल
ख़बरों में बदल जाती थी
वो एक कल मुझे दे सको तो दे दो
जहाँ मेरे छत की मुंडेर
गजलों की किताब थी और शहर एक नज्म
मै चाहता हूँ कि अपने झोले में रखे सारे आईने
पड़ोस की दूकान पर बेच आऊं
और झोले को पड़ोस वाली पहाड़ी पर बिखरे लाल पत्थरों से भर दूँ
मै अपने हाथों में लाल गुलाब की जगह
बेहया की टहनियां रखना चाहता हूँ
मै चाहता हूँ कि मेरी आँख या तो जमीन पर हो
या आसमान पर
मै चाहता हूँ उस एक जगह नंगे पाँव पहुँचजाऊं
जहाँ ना तो कोई इन्तजार था ,ना कोई उम्मीद
मै नहीं देखना चाहता हूँ उन चेहरों को
जो उस एक पल के इस पार थे
अपनी अपनी साजिशों के साथ
मुझे अपराधी बनाते हुए
अपनी अपनी मसीहाई का ढोल पीटते हुए
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
कत्थई है प्यार

मेरा प्यार किसी ७० mm की फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं
जिसमे नायक ,नायिका से जब भी मिलता है
गीत गाता हुआ मिलता है
और ना ही ये तुम्हारे उम्र के एक हिस्से में गुम हो गए
उन पलों की परछाई है
जिनमे तुमने ढेर सारे उजाले बटोरे और ढेर सारी चांदनी ओढ़ी
मेरा प्यार गुलाब का फूल नहीं है
जिसे जब चाहो तब तुम अपने ड्राइंग रूम के गुलदस्तों में सजा लो
और सबकी निगाहों से मुझे सराहो
मेरा प्यार एक लम्बा इन्तजार है
वो इन्तजार
जहाँ सिर्फ भीगी ख़ामोशी होती है
मेरा प्यार एक बाढ़ है
जो मेरे भीतर छुपे तिलिस्म को तोड़ रहा है
मेरा प्यार उस राह की थकन है
जहाँ जिस्म खुद के खिलाफ विद्रोह करता है
बार- बार
जमे हुए रक्त से भरी शिराओं में स्थिर है
कत्थई है मेरा प्यार
बुधवार, 23 जून 2010
वो जो मुझमे शामिल है |

न जाने क्यूँ कर लेता हूँ मै तुम्हे खुद में शामिल
ये जानते हुए भी कि
परदेसी बादलों का मेरे शहर से रंज पुराना है
मेरी बातों का जो सिरा तुम तक पहुँचता है
वो कुछ इस तरह गुंथा होता है
जैसे अक्सर नहाने के बाद तुम्हारे जूड़े होते हैं
उन बातों में छुपी बातों को
सावधानी से निकलती तुम
अक्सर किसी ब्लेक एंड व्हाईट फिल्म की नायिका की
तरह हो जाती हो
जिसकी निगाह प्यार में या तो जमीन पर होती है या आसमान पर
तुम जानना चाहती हो उन कविताओं के बारे में
जो तुमने मुझे याद करके नहीं लिखी
उन ग़जलों के बारे में
जिन्हें लिखते वक़्त
रात की स्याही पन्नों पर उतर आई थी
मै जानता हूँ
मै तुममे या तुम्हारी कविताओं में कभी शामिल नहीं रहता
मगर मै होना चाहता हूँ
यही एक कोशिश कविता को कविता
और प्यार को प्यार बनाये रखती है
शनिवार, 1 मई 2010
वो जो उदास है ...........
जिसके सपनो के दरवाजे /कई तालों में बंद हैं
और उन दरवाजों के आगे/ कोई राक्षस पहरा दे रहा है
न तो ताला खुलता है न ही राक्षस को नींद आती है
हाँ, ये जरुर है कि इस उदासी के बीच भी
उसके होठों का कम्पन
मेरी आँखों के चौराहे से होकर गुजरता है |
और मै /उन चौराहों पर बिखरे रंगों में सराबोर हूँ |
मै जानता हूँ उदासी की धूप ओढ़
उसने अपनी ग़जलों को रुखसत कर दिया है
और कागज़ पर/ मेरी हथेलियाँ चस्पा कर दी है
मै पूछता हूँ ,क्या ये दवा है ?
उसका वही सधा सा जवाब 'नहीं ये तकनीक है मेरे पुरुष "
जो मैंने अभी अभी सीखी है |
इस उदासी के बीच
उसकी आँखों के आंसू की कुछ बूंदें
बिटिया के बालों की लटों में खो गए है
चंद बूंदें / खिडकियों से झांकते गुलमोहर के पेडों में नजर आती है
उसने कुछ बूंदें
दूर सड़क पर रेंगते किसी साए को/ सिर्फ इसलिए दे दी
क्यूंकि शायद वो फिर कभी दुबारा आएगा
उसके आंसुओं की कुछ बूंदों ने /मेरे कलम की रोशनाई को
अब तक सुर्ख बना रखा है
उसकी ये उदासी ख़त्म करने की मेरी कोई भी कोशिश
उसे मुझसे दूर कर देती है |
इस उदासी के बीच
दरवाजों में लगे तालों पर /मैं मोम पिघलता देख रहा हूँ
वो अन्दर सपनों की दूसरी किस्त तैयार कर रही है
और हाँ ,राक्षस अब तक जाग रहा है |
शनिवार, 6 मार्च 2010
उसकी कविता से गुजरते हुए

तुम्हारी कविता पढता हुआ जब मै
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
शहर की लड़की

शहर की लड़की के लिए कविता नहीं होती
कहकहे होते हैं
जिसे वो अपने लोगों के साथ तब बांटती है
जब शहर से दूर खड़ा कोई ,शहर में आ जाता है
उसके घर की खिड़कियाँ अक्सर बंद होती हैं
कम रोशनी में उसे अपना चेहरा
ज्यादा खुबसूरत लगता है
और वो बच जाती है ,अनचाहे चेहरों को देखने से |
उसकी घडी की सुई औरों की घडी से
पांच घंटे पीछे होती है
तो उसकी रात औरों की सुबह के साथ होती है
चेहरे से अँधेरे की परत हटाने को
वो बाथरूम में देर तक नहाती है
तो बात करते करते अचानक ख़ामोश हो जाती है
शहर की लड़की के सेलफोन की घंटी और दरवाजे की चिटकनी का
सीधा नाता होता है
उसके लिए प्यार ४,२५ की ट्रेन की तरह है
जिस पर वो कभी नहीं चढ़ी ,
लेकिन
जिससे उतरने वाली भीड़ उसे पसंद है
फिर कभी किसी रोज किसी वक़्त
भीड़ में से किसी एक का हाँथ थाम
वो शहर को जिन्दा रखने निकल पड़ती है
कविता कविता रहती है ,कहकहे कहकहे रहते हैं
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
आग,पानी और कविता

क्यूँ लिखूं में कोई कविता या कोई गीत ?
चलो मै आग लिखता हूँ मेरे दोस्त
तुम जलावन बटोरो
बहुत दिनों से नहीं सुलगी ये अंगीठी
बहुत दिनों से नहीं महसूस की हमने आंच
बहुत दिन हुए हथेलियों को घुटनों में छिपाए
बहुत दिन से किसी ने माथे को नहीं चूमा
वो एक राख जो तुममे सुलग रही है
मुझ तक पहुंचकर धधक जाती है
अगर तुम कहो तो मै पानी भी लिख सकता हूँ
तुम अपनी नजरें बटोरो
बहुत दिनों से तुमने तकिये के लिहाफ नहीं धोये
बहुत दिनों से अपने घर को नहीं बुहारा
बहुत दिन हुए तुम्हारे दरवाजे के खुलने का
लम्बा इन्तजार किये हुए
बहुत दिन से तुमने अचानक बातों के बीच उठकर
चाय नहीं बनायीं
वो पानी जो तुम्हारे भीतर घुल रहा है
मुझ तक पहुंचकर स्याही बन जाता है
आग और पानी दोनों की तुम्हे भी जरुरत है
मुझे भी
कविता के न होने की यही शर्त है
सोमवार, 11 जनवरी 2010
धूप की बस्ती

तुम्हारे शहर में कोहरे का घना साया है ,
मेरे चेहरे पर भी धुंध उतर आई है,
चलो अब धूप की बस्ती को ढूंढने निकलें |
तुम्हारे पास लफ्जों की लिहाफ तो होगी
हमने भी एक उम्र से आंच बचा रखी है
चलो निकले,बस अब इस रास्ते से निकलें |
गली के मोड़ पर सूरज का रास्ता रोकें
अँधेरे का ठगा मानेगा कि न मानेगा
फिकर क्यूँ है कि मनाने में ज़माने निकलें |
तुम्हारे कन्धों पर भी यादों का कोई झोला हो
मेरे पैरों में भी रिश्तों के कसे मोज़े हों
हो गयी शाम अब निकले, उधर को निकलें|


