
मै फिर से लौटना चाहता हूँ
उस एक पल की ओर
जहाँ पावों की धूल
ख़बरों में बदल जाती थी
वो एक कल मुझे दे सको तो दे दो
जहाँ मेरे छत की मुंडेर
गजलों की किताब थी और शहर एक नज्म
मै चाहता हूँ कि अपने झोले में रखे सारे आईने
पड़ोस की दूकान पर बेच आऊं
और झोले को पड़ोस वाली पहाड़ी पर बिखरे लाल पत्थरों से भर दूँ
मै अपने हाथों में लाल गुलाब की जगह
बेहया की टहनियां रखना चाहता हूँ
मै चाहता हूँ कि मेरी आँख या तो जमीन पर हो
या आसमान पर
मै चाहता हूँ उस एक जगह नंगे पाँव पहुँचजाऊं
जहाँ ना तो कोई इन्तजार था ,ना कोई उम्मीद
मै नहीं देखना चाहता हूँ उन चेहरों को
जो उस एक पल के इस पार थे
अपनी अपनी साजिशों के साथ
मुझे अपराधी बनाते हुए
अपनी अपनी मसीहाई का ढोल पीटते हुए




