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सोमवार, 25 जुलाई 2011

सुनो श्वेताम्बरा


सुनो श्वेताम्बरा
किस्से सुनाते सुनाते शहर सो गया है
बादलों के शामियाने में
बूंदों की बैचैनी बहुत कुछ ले जाती है
बहुत कुछ कह जाती है
कविता अकेले कोने में आधी भीगी - आधी सूखी
छाता लगाये खड़ी है
कलम सिरहाने / अपने स्मृति -भ्रंश पर
सफाई देते -देते थक चुकी है
इस वक्त छत, सिनेमा का पर्दा है
और आँखें प्रोजेक्टर
वो सब कुछ जो तुमने कहे और जो तुमने न कहे
एक साथ मुझसे रेजोनेंस कर रहे
मैं चाहता हूँ कि तुम इस सोये हुए शहर को जगाओ
आओ मुझे फिर से लोरियां सुनाओ
या कोई गीत गाओ
ये भी न हो सके तो शहर के लिए ही सही
लड़ो ,झगड़ो और लौट जाओ

शनिवार, 11 जून 2011

विज्ञान


आदमी का शीशे में तब्दील होना
कोई रासायनिक अभिक्रिया नहीं
एक सामान्य भौतिक क्रिया है
जूझते ,डरते ,सहमते या फिर प्यार करते हुए आदमी
की शिराओं में
घटता बढ़ता रक्तदाब
उसे अक्सर शीशा
तो कभी -कभी पत्थर बना जाता है
टूटने के लिए जुड़ते हुए लोग
इस शहर में अकेले नहीं हैं
इस भीड़ के लिए अब वक्त है
कि वो अंकगणित को भी जाने |

गुरुवार, 2 जून 2011

सुनो श्वेताम्बरा,अब मैं टूट रहा हूँ


सुनो श्वेताम्बरा
अब मैं टूट रहा हूँ
स्मृतियों के चादर के गुलाबी रंग पर
इस मौसम के पीले पत्ते भारी पड़े हैं
थके हारे जिस्म में उत्तर चुकी आँखें
अब हथेलियों को नहीं आसमान को तकती है
कविता की जुगाली के लिए
अंगुलियाँ शब्दों को चबाती है|

कहो श्वेताम्बरा क्यूँ कर
तुमने बेंच दिए थे घर के सारे आईने
और अपने कमरे में लगा लिए थे गुलमोहर के फूल?
तुम्हे नहीं मालूम
तुम्हारे भेजे गए बादल मेरे आँगन में बरसते हैं
ये सूरज मुझे कर्जदार समझता है
और जमीन किराया मांगती है

बोलों श्वेताम्बरा
क्यूँकर बदल रही है तुम्हारी रंगत ?
तुम क्यूँकर रंगतराश नहीं हुई ?
मैं भी तुम्हारे उन रंगों में रंगता
जिनका विज्ञान सिर्फ तुम्हे पता है
कभी ज्यादा सा लाल ,कभी कम सा हरा
सुनो
मैंने तुम्हारे उन रंगों को भी देखा है
जो तुमने मुझसे छुपाये है !
ये मेरी चोरी नहीं बेरंग सी कुंठाएं हैं
तुम इनके लिए मुझे सजा न दो
तुम्हारी सपनों का रंग /
तुम्हारी हँसी का रंग
तुम्हारी धडकनों का रंग
और हाँ ,तुम्हारी ग़जलों का रंग भी मैं देख सकता हूँ |

सुनो श्वेताम्बरा
अब मैं भी लौट रहा हूँ
सारे सिरे साथ लेकर
जानता हूँ-
इन सिरों को ढूढने की कोशिश तुम नहीं करोगे
मगर
लौटते हुए क़दमों की आहट को तो सुनो
दो तलवों भर की खाली जगह भी
कभी -कभी उम्र भर की खेती के काम आती है































शनिवार, 7 मई 2011

चुप्पियों के साथ



चुप्पियों के साथ
आस- पास तुम्हारी मौजूदगी
मुझे बेहद अच्छी लगती है
कुछ भी कह पाने की मुश्किलें जितनी बढती है
उतने ही करीब आ जाते हो तुम
अब तो तुम भी जान गए हो
ज्यों - ज्यों शब्द, सलीकों के साथ बीच में आते हैं
तुम्हे उतना ही खोता चला जाता हूँ मैं
खुद को उतना ही अकेला पाता हूँ मैं
मगर ये भी सच है कि
चुप्पियों के साथ
तुमसे थोड़ी सी भी दूरी मुझे बेहद कठिन लगती है
कितना मुश्किल होता है
दूरियों को चुपचाप सहना
समय के साथ-साथ न चाहते हुए भी बहना
उस वक्त बहुत मुमकिन है मैं उन बातों पर भी उदास होऊं
या फिर नाराज हो जाऊं
जिन बातों पर मै अक्सर मुस्कुराता हूँ
उस एक वक्त /तुम्हारी कविता भी बेवफाई की एक किस्म लगती है
तस्वीरों में मुस्कुराती तुम
पार्क स्ट्रीट की लोपा बनर्जी जैसी लगती हो
जिसके लिए प्यार और गोलगप्पों में कोई ख़ास अंतर नहीं है
सच कहूँ तो मैं उन सारी तस्वीरों पर स्याही उडेलना चाहता हूँ
और चाहता हूँ/ तुम्हे यूँ मुस्कुराता देखने वाले सारे लोग नरक में जाएँ

इन दूरियों के बीच तुम्हारी जिद्द
मुझे साजिश सी लगती है
तुम्हे याद है न? ये वही जिद्द है
जिनके लिए मैं न चाहते हुए भी तुम्हे ठहाके लगा कर दिखाता था
अब मै ठहाके नहीं लगाता
अपनी फटी हुई जेब को टटोलता हूँ
या फिर खुद को श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ
जानता हूँ इस बार
चुप्पियों के बीच
देह का द्वन्द भी नंगा हो रहा है
तुम इस बार मेरी नियत को आंक रहे हो
बार -बार जो मुझमे कभी नहीं था
उसको झाँक रहे हो
मगर मैं ,फिर भी दूरियों को सह रहा हूँ
क्यूंकि
चुप्पियों के साथ
आस- पास तुम्हारी मौजूदगी
मुझे बेहद अच्छी लगती है